महात्मा फुले जी की 200जंयती पर छिंदवाडा शहर पवार टी हाउस के पास महात्मा फुले चौक आंबटन एवं प्रवेश द्वार बनाने निगम आयुक्त के महात्मा फुले शिक्षण समिति ने सौंपा ज्ञापन रखी मांग, नगर निगम में प्रस्ताव रखकर महात्मा ज्योतिबा फुले जंयती पर प्रवेश द्वार लगाने दिया आश्वासन महात्मा फुले जी की 200जंयती पर छिंदवाडा शहर पवार टी हाउस के पास महात्मा फुले चौक आंबटन एवं प्रवेश द्वार बनाने निगम आयुक्त के महात्मा फुले शिक्षण समिति ने सौंपा ज्ञापन रखी मांग, नगर निगम में प्रस्ताव रखकर महात्मा ज्योतिबा फुले जंयती पर प्रवेश द्वार लगाने दिया आश्वासन महात्मा फुले जी की 200जंयती पर छिंदवाडा शहर पवार टी हाउस के पास महात्मा फुले चौक आंबटन एवं प्रवेश द्वार बनाने निगम आयुक्त के महात्मा फुले शिक्षण समिति ने सौंपा ज्ञापन रखी मांग, नगर निगम में प्रस्ताव रखकर महात्मा ज्योतिबा फुले जंयती पर प्रवेश द्वार लगाने दिया आश्वासन सौसर की बेटी अदिति डवले ने फोरेंसिक साइंस में हासिल किया गोल्ड मेडल भाजपा जिलाध्यक्ष संदीप मोहोड ने दी बधाई एवं उज्ज्वल भविष्य की शुभकामनाएं।, अदिति ने ओरिएंटल यूनिवर्सिटी, इंदौर में एमएससी (फोरेंसिक साइंस) की परीक्षा में विश्वविद्यालय स्तर पर प्रथम स्थान प्राप्त कर गोल्ड मेडल हासिल किया। सौसर नगर सहित पूरे पांढुर्णा जिले में हर्ष और गौरव का वातावरण है। पांढुरना ग्राम सिवनी के लाल श्रावण चांदेकर बने CISF में इंस्पेक्टर, प्रधानमंत्री की सुरक्षा SPG में निभा चुके अहम् जिम्मेदारी एवं RSS प्रमुख सर संघचालक के भी रह चुके हैं PSO , वर्ष 2010 में CISF में उप निरीक्षक के पद पर अपनी सेवा शुरू की थी। छोटे से कस्बे से निकलकर केंद्रीय सुरक्षा बल में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियाँ निभाना युवाओं के लिए मार्गदर्शक एवम् प्रेरणादायक l ग्राम चांगोबा में म.प्र. आदिवासी विकास परिषद की बैठक आयोजित, जिला कार्यकारिणी के पदाधिकारियों को सौंपे गए नियुक्ति पत्र, बैठक में आदिवासी समाज से जुड़े विभिन्न मुद्दों, सामाजिक समस्याओं तथा समाज के विकास से संबंधित विषयों पर चर्चा की गई।

विश्व प्रसिद्ध गोटमार मेला सूर्यास्त समय कलश रूपी पेड़ जामनदी बीचों बीच परंपरागत रूप से किया स्थापित, सुबह 10:00 बजे मां चंडिका एवं कलश रूपी पेड़ झंडे पर निशान पेश कर गोटमार खिलाड़ियों द्वारा खेल की गई शुरुआत

*पांढुर्णा हलचल न्यूज़ संवाददाता मनोज सातपुते पांढुर्णा*

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पांढुरना गोटमार मेला की शुरुआत शुक्रवार को सूर्यास्त समय कलश रूपी पेड़ को परंपरागत रूप से नदी के बीचो-बीच स्थापित किया गया मां चंडी का भक्त द्वारा आरती पूजा अर्चना कर इस परंपरा को परंपरागत रूप से निभाया गया। मां चंडिका भक्तों द्वारा निशाना कलश रूपी पेड़ पर निशान पेश कर शादियों से चली आ रही परंपरा को सुबह 10:00 बजे शुरू किया गया।नगर में विश्व प्रसिद्ध गोटमार मेला सदियों से चली आ रहीं परंपरा के अनुसार कृष्ण पक्ष की अमावस्या दिन गुरुवार पोला त्यौहार के दुसरे दिन शुक्रवार मनाया जा रहा ।विश्व विख्यात गोटमार मेला कई शंकाओं को जन्म देता है। इस अद्भूत गोटमार मेले के बारे में कोई इतिहास संबंध विवरण उपलब्ध नहीं है। मराठी भाषा में गोटमार का अर्थ पत्थर मारना होता है। वाकई इस मेले में पत्थरबाजी की जाती है इसमें कोई दो या चार लोग दो या चार घंटे नहीं बल्कि हजारों लोग सूर्योदय से सूर्यास्त तक विपक्षी योद्धाओं पर पत्थर रूपी शस्त्रों से बौछार कर बड़ी शान से एक-दूसरे का लहू बहाते है। इस एक दिवसीय युद्ध में प्रतिवर्ष अनगिनत लोग इस पत्थर रूपी शस्त्रों से घायल हो जाते है तो कई अपने प्राणों से भी हाथ धो बैठते है। पर जगत जननी माँ चंडिका के भक्तों द्वारा इस मेले को बंद कराने में कई बाधाओं के आने पर भी अनवरत रूप से परंपरागत ढंग से इस मेले का संपन्न कराने की परिपाठी चली आ रहीं है।

*शौर्य की धार: पांढुर्णा बना इतिहास की परंपरा का साक्षी*

*जटबा राजा का पराक्रम,*

*मराठा का रणकौशल*

*मुगलो के विरुद्ध एकजुट संघर्ष की गाथा*

 *गोटमार मेला*

गोटमार मेला की शुरुआत परंपरागत रूप से सदियों से चली आ रही परंपरा के संबंध में इतिहासकार बताते हैं  की जाम नदी का न्यायसन् 1740 का समय था। मध्य भारत की पहाड़ियों के बीच बसा देवगढ़-नागपुर का क्षेत्र एक बड़े ऐतिहासिक बदलाव से गुजर रहा था। इस क्षेत्र की सबसे मजबूत सैन्य गढ़ी (किला) पांढुर्णा में स्थित थी, जिसे देवगढ़ साम्राज्य के मूल पुरुष और प्रतापी राजा जाटबा शाह की सेना संभाल रही थी। पांढुर्णा के इसी किले में राजा जाटबा ने अपनी आराध्य और कुलदेवी माँ चंडी की स्थापना की थी, जिनके प्रति पूरे क्षेत्र में अगाध श्रद्धा थी।दूसरी ओर से एक अजेय महाशक्ति का आगमन हो चुका था—नागपुर के मराठा शासक राजा रघुजी भोसले प्रथम। रघुजी भोसले विदर्भ और मध्य भारत में मराठा साम्राज्य का विस्तार कर रहे थे। पांढुर्णा के पास दोनों सेनाएं आमने-सामने खड़ी थीं, और उनके बीच सीमा रेखा बनकर बह रही थी—जाम नदी।एक सुबह, राजा रघुजी भोसले ने अपनी रणनीतिक कुशलता और सैन्य संप्रभुता का प्रदर्शन करने के लिए जाम नदी के ठीक बीचों-बीच स्थित एक ऊंचे पलाश के पेड़ पर मराठा साम्राज्य का भगवा ध्वज फहरा दिया। यह सीधे तौर पर पांढुर्णा के किले और जाटबा राजा की सेना को एक बड़ी चुनौती थी। शर्त यह रखी गई कि जो भी पक्ष नदी के बीच जाकर इस ध्वज को अपने पाले में लाएगा, इस समृद्ध सीमांत क्षेत्र के राजस्व और प्रशासन पर उसी का अधिकार माना जाएगा।राजा जाटबा शाह की सेना ने जब यह देखा, तो उनके भीतर का स्वाभिमान जाग उठा। लेकिन दोनों पक्षों के नायक—राजा जाटबा शाह और राजा रघुजी भोसले—अत्यंत बुद्धिमान और दूरदर्शी थे। वे जानते थे कि तलवारों और बारूद के पारंपरिक युद्ध से भारी नरसंहार होगा, जिससे दोनों ही राज्यों की प्रजा का नुकसान होगा। इसलिए, दोनों राजाओं ने आपसी सहमति से एक ऐतिहासिक निर्णय लिया: यह युद्ध अस्त्र-शस्त्र विहीन होगा। यह केवल शारीरिक बल, ढाल की सुरक्षा और पत्थरों की रणनीति का खेल होगा।जैसे ही राजा जाटबा की सेना के वीर सैनिक जाम नदी की तेज धार में कूदे, सावरगांव के छोर पर खड़ी राजा रघुजी भोसले की अनुशासित मराठा सेना ने उन्हें पीछे धकेलने के लिए नदी के बड़े-बड़े गोट (पत्थरों) से प्रहार करना शुरू कर दिया।देखते ही देखते शांत बहने वाली जाम नदी एक अद्भुत रणक्षेत्र में बदल गई। हवा में पत्थरों की बौछार हो रही थी। एक तरफ से ‘चंडी माता की’ के नारे गूंज रहे थे, तो दूसरी तरफ से ‘हर हर महादेव’ का शंखनाद हो रहा था। जाटबा राजा की सेना ने अपनी मजबूत लकड़ी की ढालों को आगे किया और पत्थरों की उस भयंकर मार को छाती पर झेलते हुए, पानी को चीरकर नदी के बीच के पलाश पेड़ की ओर कदम बढ़ाए।घंटों चले इस साहसिक और अद्वितीय संघर्ष के बाद, जाटबा राजा के वीर सैनिक पत्थरों की उस भयंकर बौछार को भेदकर पलाश के पेड़ तक पहुँचने में सफल रहे और उन्होंने उस विजय ध्वज को प्रमुख शस्त्र कुल्हाड़ी के निरंतर वार से पलाश रूपी (पेड़) ध्वज को अपने कब्जे में ले लिया। जाटबा राजा की सेना ने अपनी मातृभूमि की आन और चुनौती को जीत लिया था।पलाश रूपी ध्वज के उतरते ही राजा रघुजी भोसले ने तुरंत युद्ध विराम का आदेश दिया। मराठा शासक ने जाटबा राजा की सेना के इस अभूतपूर्व शौर्य और साहस का दिल से सम्मान किया।शाम ढलते ही, दोनों पक्षों के सैनिक अपनी प्रतिद्वंद्विता को भूलकर, एक साथ गाजे-बाजे के साथ पांढुर्णा किले के भीतर स्थित माँ चंडी के मंदिर की ओर बढ़े। उस जीते हुए पलाश ध्वज को माँ चंडी के चरणों में समर्पित कर दिया गया। राजा रघुजी भोसले ने स्वयं आगे बढ़कर माता के मंदिर की पवित्र भभूति (राख) ली और जाटबा राजा के घायल सैनिकों के माथे पर लगाई। दोनों पक्षों ने एक-दूसरे को गले लगाया और इस सीमाई गतिरोध को हमेशा के लिए एक सम्मानजनक शांति समझौते में बदल दिया। ओर दोनों सेना ने मिलकर मुगलों को खदेड़ दिया, दोनों सेना का शक्तिशाली रूप देख मुगलो ने क्षेत्र से पलायन किया,इतिहास की इसी महान घटना—राजा जाटबा शाह की सेना के शौर्य, राजा रघुजी भोसले की युद्ध नीति और माँ चंडी की अगाध आस्था की याद में आज भी पांढुर्णा और सावरगांव के लोग हर साल जाम नदी के तट पर इकट्ठा होते हैं, जिसे पूरी दुनिया ‘गोटमार मेले’ के रूप में जानती है।

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